“जर्जर की यात्रा”
अभी तो मैं जर्जर हूँ,
इक रोज़ चला जाऊँगा।
जमीन को आसमाँ से मिलते हुए देखा है,
बस उसी की तलाश में,
किसी रोज़ चला जाऊँगा।
लगा है दाग चुनर में, शर्म भी आती है,
उसी दाग को मिटाने,
मैं चला जाऊँगा।
घर से बेघर हुआ हूँ बहुत अरसे से,
वही घर ढूंढ़ने,
मैं चला जाऊँगा।
पिया के प्यार में पागल हुआ मैं दीवाना,
उसी से नेह जताने,
मैं चला जाऊँगा।
बहुत मह़रूम हूँ मैं, अजीब है दास्ताँ मेरी,
उसी के धाम में बयां करने,
मैं चला जाऊँगा।
गरीब था, गरीबी में कटी है ज़िंदगी,
वहीं उस कर्ज़ को चुकाने,
मैं चला जाऊँगा।
शुक्रगुज़ार हूँ मैं दर्द और जमाने का,
उसी दर्द को मिटाने,
मैं चला जाऊँगा।
मिलन की प्यास मन में बसी है कब से,
उसी प्यास को बुझाने,
मैं चला जाऊँगा।
अभी तो मैं जर्जर हूँ,
बस इक रोज़ चला जाऊँगा।
– महेंद्रकुमार सिंह
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