” मैं भी शूद्र हूं “
मैं भी शूद्र हूं, दलित हूं, पिछड़ा हूं,वंचित, आदिवासी, उपेक्षित और तिरस्कृत।कहने को तो स्वतंत्र हूं,पर क्या स्वतंत्र हूं? भेदभाव का विष कभी घूंट-घूंट पिया,कभी अनदेखा कर आगे बढ़ा,पर क्या इनकार कर सकता हूंकि मेरे हिस्से का सूर्य सदियों सेअधूरे उजाले में डूबा रहा? ज्ञान की धरा पर पग धरते हीगुरुजी की वाणी झंझनाती है—“मनहूस!…